Friday, April 11, 2008

काबिल व्यक्ति ही क्यों अधिक परेशान होते हैं

विद्वान् अक्सर यह कहते देखे जाते हैं की कर्महीन व्यक्ति ही भाग्य के भरोसे रहते हैं और कर्मयोगी अपना भाग्य स्वयं banate हैं. हो सकता है यह बात सौ फीसदी सही हो किंतु प्रश्न यह उठता है कि कोई व्यक्ति कर्महीन होता ही क्यों है? वो कारण कौन से हैं जो एक व्यक्ति को कर्महीन होने को मजबूर करते हैं और दूसरे को कर्मयोगी? दूसरा महत्तवपूर्ण प्रश्न यह है कि क्यों कोई व्यक्ति कर्महीन का कलंक जानबूझकर अपने माथे पर चस्पा करना चाहता है?
जबाव मिलता है "आलसी है, कुछ करने का प्रयत्न करता ही नहीं है."
बात सही है, परन्तु सिर्फ आलसी होना ही किसी व्यक्ति के कर्महीन होने के लिए पर्याप्त नहीं होता अगर होता भी है तो ऐसा उसके स्वभाव के कारण होता है और अपना स्वभाव बदलना प्राणी के हाथ मैं नहीं होता.
यहाँ मेरा प्रयास किसी व्यक्ति को कर्म न करने के लिए प्रोत्साहित करना नहीं है बल्कि यह समझाना भर है कि जन्मजात स्वभाव को एक निश्चित समय आने से पहले बदलना मनुष्य के हाथ में नहीं होता.
"अजगर करे ना चाकरी" अजगर के स्वभाव को व्यक्त करती है, सांप कोबरा भी होता है, सांप अजगर भी होता है, ना कोबरा अजगर का स्वभाव ग्रहण कर सकता है ना ही अजगर कोबरा जैसा बन सकता है.
हम सभी जानते हैं कि इश्वर ने हमें सब कुछ प्रदान करने के बाद भी सारा नियंत्रण अपने हाथ में रखा है. कुछ ज्ञानी कहते हैं कि स्वभाव नाम कि कोई चीज़ नहीं होती, मनुष्य यदि अपने अन्दर दृढ निश्चय पैदा कर ले तो वह असंभव को सम्भव कर सकता है. जब उनकी ज्ञान वाणी दृढ निश्चयी सुनता है तो वह प्रसन्न हो जाता है परन्तु अनिश्चय कि स्थति में हरदम फंसा रहने वाला दूसरा व्यक्ति यह तुरंत मान लेता है कि उसकी असफलता के पीछे वास्तव मई उसकी अस्थिर चित्त प्रवृति ही है वह दृढ निश्चय करता है कि वह अपने स्वभाव में परिवर्तन लाएगा और जो भी करेगा दृढ निश्चय से करेगा परन्तु ऐसा कभी नहीं हो पता. थोड़ा सा समय बीतते ही उसकी पुरानी दिनचर्या प्रारम्भ हो जाती है क्योंकि स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए जिस दृढ निश्चय कि आवश्यकता थी वह उसमें होती ही नहीं.
कितने आश्चर्य कि बात है कि हम अपने हिसाब से किसी भी व्यक्ति के बारे में उसके सफल असफल होने कि धारणा बना लेते हैं जबकि हम जानते हैं कि बिना इश्वर की इच्छा के कुछ नहीं होता. बिडम्बना ये है कि जिसके हिस्से में खुशियाँ आती हैं, जो परमपिता कि असीम अनुकम्पा से, प्रकृति की खास नज़रे इनायत से भाग्यवान होता है वाही मनुष्य "ना शुक्रा" हो जाता है. जिसे इश्वर 'इज्ज़त, दौलत, ताकत से नवाज्ता है वो मनुष्य कहता है कि मैंने यह सब अपनी बुद्धि, अपनी मेहनत से अपनी काबिलियत से बनाया है. वो कहता है कि भाग्य कि बात तो कमज़ोर लोग करते हैं. वहीं भाग्यहीन व्यक्ति हमेशा इश्वर को याद करते रहते हैं उनका कहना होता है कि उनका भाग्य ही खराब है जिस वजह से वो काबिल होते हुए भी कुछ कर नहीं पा रहे.
कहा जाता है कि माता-पिता की सबसे लाडली संतान ही माता पिता को अधिक गालियाँ देती है और यही वे भाग्यवान लोग करते हैं.

1 comment:

राज भाटिय़ा said...

अहमद मियां,भाग्य के सहारे सिर्फ़ आलसी ओर जाहिल ही रहते हे कर्मजोगी नही, अगर आप के भाग्य मे खाना हे तो थाली से ऊठाना भी तो पडेगा,अपने आप तो मुहं मे नही आ जाये गा, बाकी जिन के मां बाप ने मेहनत से,हेरा फ़ेरी से, कंजुसी से किसी भी तरह से बहुत सा धन कमा कर रखा दिया तो बच्चे को मेहनत की आदत भी नही, ऎसे लोग भी भाग्य का रोना रोते हे,सफ़लता ओर असफ़लता हमारी समझ से, हमारी गलती से होता हे, लेकिन कर्मजोगी असफ़लता से सबक लेता हे, ना की भाग्य का रोना नही रोता